Sunday, June 17, 2012

आज फादर्स डे है। आज के दिन दुनिया की उन तमाम सुसंतानों के लिए एक अनोखा उपहार जो किसी भी सफल संतति के लिए पिता के अमर और अक्षुण्ण आषीर्वाद के रूप में सहेजकर रखने योग्य है। प्रस्तुत है प्रकाश पंड्या की यह रचना -

पिताजी की तर्जनी

याद है वो दिन 
आज भी
जब
अपनी मुट्ठी में कसकर मेरी तर्जनी थामें
पिताजी दिलाने ले गए थे मुझे
पाठषाला में पहले पहल दाखिला ।
घर से स्कूल तक की राह में
दी गई नसीहतें जिन्दा हैं
आज भी
जेहन में।
कहा था-
सूरज की तरह चमकने की तमन्ना से पहले
पैदा करना सूरज की तरह जलने की कूव्वत,
विराधियों के पीछे पड़ने पर
मन ही मन उत्सव मनाना कि
तुम कइयों से आगे हो।
पिताजी ने बताया था-
किसी अपने ही खास के हाथों
ठगे,लुटे और छले जाने पर
सोचना कि
यूं अकारण किसी अपनों के हाथों
ठगे,लुटे और छले जाने से
निज पापों का पहाड़ कटता है।
और हां कहा था,
एक बात सदैव याद रखने को -
मिलेगा उतना ही
जितना रखोगे भीतर से
देने का साहस।
पिता की मुट्ठी में कसकर तर्जनी थामें
नापी गई घर से स्कूल तक की वो राह
नहीें थी किसी यात्रा,जियारत से कम।
दुनियावी तालीम हासिल करने की
नन्हंे कदमों की उतावल में
दिल की किताब के पन्नों पर
अंकित पिता की वे नसीहतें
खुषी में, गम में
तन्हाई में,सुकून में,
मुझे देती हैं
ंबेषुमार ताकत।
दुनिया की किताब पढ़ते- पढ़ते
थक जातें हैं जब चर्म चक्षु
तब-
मन की आखों से पढ़ लेता हंू
पिताजी की कालजयी नसीहतों से भरी
वो दिल की किताब।
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